वक्त की बात

रख दिए उम्मीदों के पुलिंदे ताक पे

ज़िंदगी रही तो पहुँचेंगे इस मुक़ाम पे

ना जाने ये कौन सी

घड़ी है आयी

सभी अपनों से ना मिलने की

दे रहे हैं दुहाई

वक्त का पहरा पड़ा है

ना जाने कौन सी गल्ती है दोहराई

ए मनुष्य ठहर जा मुसीबत की घड़ी है आयी

छटेंगे ये मुसीबतों के बादल भी

प्रकृति ने ली है अंगड़ाई

ये प्रकृति भी अपने योवन पर

देखो कैसे इतराई

कहते है बस थोड़ा सा वक्त दो इस वक्त को

ये विपदाओं के बादल भी छटेंगे

हम कल भी मिले थे

आगे भी मिलेंगे

वक्त दो इस वक्त को

विपदाओं के बादल जल्दी ही छटेंगे