जब तक है जान

जब तक है जान

लड़ते रहेंगे एक परिंदे की तरह

वो भी जी लेता है

कभी ऊँची उड़ान भर कर

कभी पंख फड़फड़ा कर

वो भी तो सोचता होगा

ना जाने कब मंज़िल मिलेगी

उसके भी हौंसले तो देखिए

कभी उड़ता है

कभी गिरता है

मगर मंज़िल की तलाश में

उड़ता ही रहता है

हम भी तो एक परिंदे ही हैं

बढ़ते ही जा रहे हैं

कभी रुकते हैं कभी गिरते हैं

गिर कर भी उठ जाते हैं

मगर ये दुनिया भी बड़ी ज़ालिम है

उड़ते को देख नहीं सकती

गिरते को उठा नहीं सकती

ए मानव अपने पर मत इतरा

बुलंदियाँ हांसिल करनी हैं तो

एक परिंदे की तरह बढ़ता ही जा बढ़ता ही जा

जय सिया राम