मुसीबते करोना

ग़र संभल गए होते समय पर हम

तो ये ज़िल्लत नहि उठानी पड़ती

मुँह पे मास्क पहना होता

थोड़ी चहल कदमी में रोक लगायी होती

शर्तिया कहते हैं हम

ये करोना नाम की मुसीबत दोबारा ना आयी होती

अब भी समय है यारों

सम्भल जाओ इस मुसीबत की घड़ी में

साथ दो एक दूसरे का

ये वो घड़ी है जो दर्द से भरी है

जिन्होंने अपनों को खोया

पूछो हाल उनका

क्या बीती होगी उनपर

ये भी एक दौर है

प्रकृति ने छिपा के रखा था

हर इंसान पैसे कमाने की होड़ में

भागता चला जा रहा था

ए मनुष्य ठहर जा

अब भी वक़्त है सम्भल जा

अपनों के साथ बैठ कुछ गुफ़्तगू करले

पता नहीं अपनों से मिलने का समय भी दोबारा मिल ना पाए

कुछ पल मिले हैं घर पर अपनों के साथ गुजर जाएँगे

फिर वही वापिस मस्ती भरे दिन आएँगे