दास्ताने ज़िंदगी

ये ज़िंदगी की रफ़्तार यूँही बढ़ती जा रही है

आगे क़िस्मत पीछे मौत खड़ी हुई है

सोचती हूँ क़िस्मत पर भरोसा करूँ

तो मौत आँख दिखा रही है

ये कैसी गुफ़्तगू है

ये ज़िंदगी बता रही है

ज़िंदगी पर घमंड किया तो

मौत ने भी दिल्लगी की

ज़िंदगी तू अब कहाँ और किधर जा रही है

वक्त के फेरे में पड़ गया हर इंसान जो है

मौत से तो ज़िंदगी भी घबरा रही है

जीने की चाह तो थी आज भी

मगर अपनों से मिले ज़ख़्म से

आज क़िस्मत भी आँख दिखा रही है

बहुत गिले शिकवे थे ए ज़िंदगी तुझसे

नादाँ हैं वो जो अपनी क़िस्मत पर नाज़ हैं करते

देखो वक्त की सुई आगे बढ़ती जा रही है

इंसान की भी फ़ितरत बदलती जा रही है

अब वफ़ाई पर भी बेवफ़ाई हुक्म चला रही है

ये ज़िंदगी की रफ़्तार यूँही बढ़ती जा रही है